सोमवार, 10 दिसंबर 2012

भारत मुक्ति मोर्चा की उत्तर प्रदेश स्तरीय महारैली ज्योतिबा फूले ग्राउण्ड लखनऊ सफलतापूर्वक संपन्न!
ये जो प्रदेशव्यापी रैली का आयोजन किया गया है। और इस रैली में सारे उŸार प्रदेश से उपस्थिति है सबसे पहले मंै सभी लोगांे का धन्यवाद ज्ञापन करता हूँ।
साथियांे आज ये जो रैली आयोजित की गई है इस रैली मंे सात मुद्दे है जिसके लिए यह रैली आयोजित की गई है। पहला मुद्दा है अनुसूचित जाति और जनजाति के पदो मंे आरक्षण दूसरा मुद्दा है ओबीसी को संख्या के आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए अर्थात ओबीसी को 52 प्रतिशत पर 52 प्रतिशत मिलना चाहिए। तीसरा मुद्दा है समाजवादी पार्टी द्वारा मुसलमानांे को पिछले विधानसभा मंे 18 प्रतिशत आरक्षण देने की बात का वादा किया गया था तो मुसलमानों को 18 प्रतिशत आरक्षण दिया जाना चाहिए। चैथा मुद्दा है जाति आधारित गिनती और ओबीसी की जाति आधारित गिनती संसद मंे अश्वासन दिये जाने के बावजूद भी जब ओबीसी के साथ धोखाधड़ी की गई तो वो भी एक मुद्दा यहाँ पर रखा गया। पाँचवा मुद्दा है अतिपिछड़ी जातियांे को न्याय दिया जाये। छठा मुद्दा है कि प्रबंधकीय माध्यमिक एवं महाविद्यायल मंे जो प्रधानाचार्य के एकल पद को खत्म करने का जो कार्यक्रम चलाया गया है उस मुद्दे को भी यहां रखा गया है। सातवाँ मुद्दा है कि सत्र न्यायलयांे एवं उच्च न्यायालय मंे वकीलों की नियुक्ति मंे मेवालाल बनाम राज्य सरकार एवं अन्य के निर्णय का पालन करने के लिए। ये सात मुद्दे है।
साथियांे ये जो सात मुद्दे जिसके लिए यह रैली आयोजित किया गया है। इसमें जो पहले नंबर का जो मुद्दा यह बहुत बड़ा मुद्दा है इसलिए इस रैली मंे इस विषय के बारे मंे कुछ बाते बताना चाहूँगा और समझाना चाहूँगा। साथियों अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए 26 जनवरी 1950 को जब संविधान लागू हुआ। उसके बाद 1955 से रिजर्वेशन इन प्रमोशन भारत मंे लागू है। हम ऐसा कह सकते है यह 1955 से लागू है। 1955 से शुरू मंे यह कहा जा सकता है कि यह लागू था अगर यह लागू था। तो क्यूँ और कब खत्म किया गया तो आप लोगों को इसके बारे मंे थोड़ा जानना होगा कि किस परिस्थिति के अन्तर्गत खत्म किया गया।
साथियों आप लोगों मे से कुछ लोगांे को याद होगा कि 16 नवंबर 1992 इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार यह जो केस चला यह केस अदर बैकर्वड क्लासेज के मंडल कमीशन पर चलने वाली थी। जब यह केस मंडल कमीशन के केस अदर बैकर्वड क्लासेज की केस थी और इसके बारे में सुप्रीम कोर्ट 16 नवंबर 1992 को फैसला दिया ज्यादातर अदर बैकवर्ड क्लासेज के लोगों का यह मानना है यह निर्णय अदर बैकवर्ड क्लासेज के हित मंे है मगर यह बताना चाहता हूँ कि यह निर्णय अदर बैकवर्ड क्लासेज के निर्णय में नहीं है। यह बात बैकवर्ड क्लासेज के नेताआंे को पता नहीं है तो कार्यकर्ताओं को कैसे पता होगा और जब कार्यकर्ताओं को पता नहीं होगा तो समाज के लोगों को कैसे पता होगा। मैं इस विषय पर कई बार उŸार प्रदेश मंे बोल चुका हूँ। फिर भी कुछ बाते आप लोगांे को बताना चाहता हूँ। पहला निर्णय कि 52 प्रतिशत ओबीसी को 52 प्रतिशत आरक्षण नहीं मिलेगा। यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने 16 नवंबर 1992 को दिया। और कहा कि 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहंी दिया जा सकता। यह उन्होंने अपने निर्णय मंे नीचे लिखा। जो 700 पेज का डिसीजन है यह ऐपेक्स कोर्ट के इतिहास मंे यह 700 पेज इतना बड़ा डिजीशन है अगर हस्त लिखित मंे देखा जाये जो करीब 2000 पेज का यह डिसीजन है। और यह डिसीजन अदर बैकवर्ड क्लास के समर्थन मंे नहीं बल्कि विरोध मंे लिया गया। मैं केवल एक बात बताकर आपको बताऊँगा कि यह निर्णय कैसे गलत है संविधान मंे अनुसूचित जाति/जनजाति को उनके संख्या के आधार पर आरक्षण दिया इससे सिद्ध होता है कि भारत का संविधान संख्या के सिद्धांत को मान्यता देता है। यदि संविधान ने अनुसूचित जाति/जनजाति को संख्या के अनुपात मंे आरक्षण दिया तो यह बात ओबीसी पर भी लागू किया जाना चाहिए था। यदि सुप्रीम कोर्ट ऐसा निर्णय देती तो यह न्यायोचित और सर्वोपरी माना जाता। परन्तु न्यायपालिका ने 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता है जिस पर निर्णय दिया यह संवैधानिक नहीं हैं। क्योंकि जब सुप्रीम कोर्ट यह निर्णय लिख रही थी उसी समय तमिलनाडू में 69 प्रतिशत आरक्षण आॅल रेडी लागू था। इसका मतलब यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट मंे जो न्यायधीश बैठे है उनको मालूम नहीं होगा, मालूम नहीं था ऐसा नहीं कहा जा सकता है। इस लिए यह पहला निर्णय अदर बैकवर्ड क्लासेज के विरोध में है। और दूसरा निर्णय रिजर्वेशन होगा और वह नौकरियांे मंे होगा। और यह 27 प्रतिशत आरक्षण होगा मगर यह क्रीमिलेयर के साथ होगा क्रीमिलेयर यह भारत  के संविधान मंे नहीं है। भारत के संविधान मंे लिखा हुआ है सोशली एड ऐजूकेशनली बैकवर्ड क्लास, इकोनोमिकली बैकवर्ड लिखा हुआ नहीं है तो न्यायपालिका को संविधान लिखने का अधिकार नहीं है। संविधान लिखने का अधिकार संसद को है। जबकि न्यायपालिका को संविधान लिखने का कोई अधिकार नहीं है न्यायपालिका ने अपनी मर्यादा से आगे बढ़कर उल्लघंन करते हुए बैकवर्ड क्लासेज के विरोध मंे निर्णय दिया। और मंडल कमीशन के निर्णय के समय यह लिखा कि पिछड़े वर्ग के अन्दर जो ज्यादा गरीब है। उन लोगों को इसका फायदा होना चाहिए। तो मैं आपको बताना चाहता हूँ सुप्रीम कोर्ट मंे बैठे न्यायधीशांे को बताना चाहता हूँ। रिजर्वेशन जो बाबासाहब ने लिखा ये कोई गरीबी निर्मूलन का कार्यक्रम नहीं है। रिजर्वेशन गरीबी निर्मूलन करने के लिए नहीं बनाया। अगर सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश को वास्तव मंे पिछड़े वर्ग मंे जो गरीब है उनके लिए ज्यादा सहानुभूति है तो सुप्रीम कोर्ट के जजों प्रधानमंत्री को प्लानिंग कमीशन को माईनाक्स कमीशन को  पार्टी बनाकर उनको अपने बजट में गरीबी निर्मूूलन में बजट आवंटित करने का निर्देश देती तो यह माना जा सकता है की सुप्रीम कोर्ट के जजांे को पिछड़ी जाति के गरीबांे के प्रति सहानुभूति है। मगर सुप्रीम कोर्ट के जजो ने ऐसा नहीं किया उन्होंने रिजर्वेशन मंे इकोनामिक क्राइटेरिया इन्सटूट किया। ये लिखने का अधिकार उनको नहीं है संविधान ने उनको लिखने का अधिकार नहीं दिया है। संविधान लिखने का अधिकार संसद के विधि मंडल को है न्यायपालिका को नहीं। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि बाबा साहब ने लिखा कि उन लोगों को प्रमोशन में आरक्षण देना चाहिए जिन लोगों को प्रशासन मंे प्रयाप्त प्रतिनिधि नहीं है। यह लिखी हुई बात है। संविधान मंे जो लिखा है उसको मानकर सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय नहीं दिया सुप्रीम कोर्ट ने मनमानी करके ऐसा किया। तो सुप्रीम कोर्ट को मनमानी करने का कोई अधिकार नहीं है। और अगर सुप्रीम कोर्ट मनमानी तरीके से निर्णय करना चाहती है तो हमें ऐसे निर्णय मंजूर नहीं है। जो निर्णय संविधान के विरोध मंे होगे ऐसे कोई भी निर्णय हमंे मंजूर नहीं है।
मा.वामन मेश्राम साहब ने अपने अध्यक्षीय संदेश में कहा कि तीसरा निर्णय है कि अदर बैेकर्वड क्लासेज के लोगों को रिजर्वेशन होगा मगर रिजर्वेशन इन प्रमोशन नहीं होगा। तो अदर बैकवर्ड क्लास के जो लोग है उनको इसके विरोध मंे लड़ना चाहिए था। जब अदर
बैकवर्ड क्लासेज के विरोध मंे सुप्रीम कोर्ट निर्णय दे रही थी तभी वहीं पर लिखा कि अनुसूचित जाति/जनजाति को भी प्रमोशन मंे आरक्षण खत्म कर दिया जाये। मैं आपको बताना चाहता हूँ यह केस ओबीसी का था और ओबीसी का वकील सुप्रीम कोर्ट मंे हाजिर था मौजूद था ओबीसी के लोगांे को नोटिस इश्यू हो गया था। ओबीसी के लोग बहस कर रहे थे। अनुसूचित जाति और जनजाति को नोटिस इश्यू नहीं हुआ और अनुसूचित जाति पार्टी नहीं थी। तो उनका वकील बहस भी नहीं कर रहा था। इसका मतलब सुप्रीम कोर्ट ने उनकी बात सुनी भी नहीं थी और बगैर सुने सुनायी (दुनिया की किसी भी यह नेच्युरल ही कोर्ट का नियम है) कि अगर कोई भी कोर्ट मंे जाता है तो कोर्ट उसके विरोध मंे या समर्थन में फैसला देता है। मगर अनुसूचित जाति के लोग इस केस मंे शामिल ही नहीं थे फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला उनके विरोध मंे दिया। क्या हम कह सकते है कि जो सुप्रीम कोर्ट में बैठे जज है उनको अकल नहीं है, क्या वो गधे है, बेवकूफ है ऐसा कह सकते है क्योंकि उन्हंे ऐसा नहीं कह सकते है कि उनको समझ मंे नहीं आया, ऐसा इस लिये कहा ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि हाईकोर्ट मंे जज होते है उनको प्रमोशन  कर आगे सुप्रीम कोर्ट मंे लिया जाता है। या जो जज हाईकोर्ट में विद्वान हो जाते है उनको सुप्रीम कोर्ट मंे लिया जाता है। यदि ऐसा किया जाता है तो हम ऐसा नहीं कह सकते है कि सुप्रीम कोर्ट केे जजो को एक नेच्युरल जस्टिस नहीं मालूम है, इसलिए उन्होनंे गलत निर्णय दिया इसका मतलब है सुप्रीम कोर्ट के जजों ने जानबूझकर निर्णय दिया। इसका मतलब है कि संविधान के विरोध मंे नैसर्गिक न्याय के विरोध में जाकर यह निर्णय देने का काम किया। यदि न्यायधीश ऐसे ही काम करते रहे। संविधान में विरोध मंे जाकर निर्णय देते रहे तो ऐसे न्यायधीशो को मैं इस मंच से संविधान विरोधी और देशद्रोही घोषित करता हूँ। और ऐसे लोगों के पिछवाड़े पर ताल मारनी चाहिए और उनको चैराहे पर लाकर पीटना चाहिए। इस पर कई बार सुप्रीम कोर्ट के वकील ने मुझसे कहा कि मेश्राम जी ऐसा नहीं बोलना चाहिए मैंने कहा क्यों नहीं बोलना चाहिए तो उन्होंने कहा कि कन्टम आॅफ कोर्ट होगा तो मैंने कहा कि कन्टम आॅफ कोर्ट होगा तो क्या होगा।
तो उन्हांेने कहा कि न्याय पालिका की अवमानना होगी। तो मैंने कहा कि न्यायपालिका की अवमानना होगी तो क्या होगा, तो कहा कि सजा होगी तो मैंने कहा कितनी होगी तो बोले 6 महीनेें की होगी तो मैंने कहा की ज्यादा तो नहीं होगी तो उन्होंने कहा कि ऐसा उसमंे लिखा है। तो मैेंने कहा कि मैं बोलना बंद करने वाला नहीं हूँ मैं और जोर से बोलूगाँ ऐसे सुप्रीम कोर्ट को अधिकार है कि वह सीओ को नोटिस इश्यू करें स्वतः संज्ञान लेने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास है मेरे खिलाफ केस दायर करें और मुुझे जेल मंे डाले। मैं इसके लिए तैयार हूँ। अरे भाई मैं 20 साल से बोल रहा हूँ और 20 साल से कोई कोर्ट मुझे जेल मंे नहीं डाल रही है। मैं तो कहता हूँ भाई जेल मंे डालो केवल 6 महीना ही जेल होगा। तो मैंने वकील साहब से कहा कि मेरे विरोध मंे कुछ नहीं हो सकता तो वे बोले ऐसे कैसे नहीं हो सकता आश्चर्य से पूछा तो मैंने कहा कि देखिए आजादी के आंदोलन मंे गांधी जी का एक कार्यक्रम था सिविल डिसोवियस (सविनय अवज्ञा) इसमंे गांधी जी क्या करते थे वे चैराहे पर जाते थे और कानून तोड़ते थे और कहते थे कि मैं विनय पूर्वक कानून तोड़ रहा हूँ, और अंग्रेज की पुलिस आती थी और गांधी जी को विनय पूर्वक पकड़ती थी और विनय पूर्वक जेल मंे डाल देती थी। तो दूसरे दिन के अखबार मंे छपकर आती थी कि अंग्रेजो की पुलिस ने गांधी जी को जेल मंे डाल दिया जबकि गांधी ने चोरी नहीं की, डकैती नहीं की फिर भी अंगेे्रजो ने उनको जेल मंे डाल दिया। जब ऐसी खबर छपकर आती थी तो जो सारी सहनुभूति जनता की थी वह गांधी को मिलती। गांधी बार-बार ऐसा करते और गांधी की सहानुभूति बढ़ती गई और बढ़ती गई और गांधी जी महान हो गये वे जेल मंे जाते-जाते महान हो गये। कितने महान हो गये कि एक दिन गांधी ने कहा कि अंग्रेंजो को कहा कि चले जाओ भारत छोड़ो जो अंग्रेज गांधी को जेल मंे डालते थे उनको उन्हांेने कहा तो मैंने कहा वकील साहब यदि उन लोगों ने मुझे जेल मंे डाला तो मैं भी गांधी की तरह महान हो जाउगाँ। मै कौन सी चोरी कर रहा हूँ कौन सी डकैती कर रहा हूँ मैं भी तो समाज के  हित मंे काम कर रहा हूँ। तो मेरे प्रति लोगों की सहानुभूति बढ़ जायेगी तो मैं भी महान हो जाऊँगा तो अगर मैंे महान हो गया तो जिस तरह से गांधी ने अंगे्रजो को कहा कि यहाँ से जाने के लिए कहा तो मैं भी किसी को यहाँ से जाने के लिए कह सकता हूँ तो किसको भारत को छोड़ने के लिए कहना पड़ेगा जैसे गांधी ने कहा कि अंगे्रजो भारत छोड़ो तो ब्राह्मण अगर जेल मंे डालते है कि तो मैं ब्राह्मणांे को कहूँगा भारत छोड़ो तो मैंने वकील साहब से कहा कि इसलिए वे मुझको जेल मंे नहीं डालेगे दूसरा कारण है कि ये जो संवैधानिक भाषा है इसको केवल एक व्यक्ति वह भी वामन मेश्राम जानता है और करोड़ो लोग जानते ही नहीं तो वे शायद सोचते होगे कि अगर वामन मेश्राम को जेल मंे डाल दिया जायेगा तो करोड़ो लोगांे को मालूम हो जायेगा कि न्यायपालिका संविधान के साथ धोखाधड़ी कर रही है।
यदि करोड़ो को मालूम हो गया कि न्यायधीश संविधान के साथ धोखाधड़ी कर रहे है तो जो शासक वर्ग ब्राह्मण है उसके लिए सबसे बड़ा खतरा और बढ़ जायेगा मैने वकील साहब से कहा कि इसलिए वे मुझे जेल मंे नहीं डाल रहे है इसलिए मैंे खुद ही जेल मंे जाने की सोच रहा हूँ 2015 तक ऐसे ही जेल मंे जाने की तैयारी कर रहा हूँ और 2016 मंे 5 हजार तहसीलों से 50 हजार ब्लाक से और 6 लाख गांवांे से जेल भरो आंदोलन हम लोग चलायेगें। जेल मंे पहले से ही संख्या इतनी है कि हमें कहां रखेगंे और नहीं रखेगंे जेल में तो बाहर आकर फिर दुबारा जायेगें। इसलिए आने वाले समय हम लोगांे को अपनी समस्याआंे का समाधान करने के लिए हमें बहुत कुछ करना होगा। तो मैं आपलोगांे को तीसरा मुद्द बता रहा था कि अगर अदर बैकवर्ड क्लास को पदोन्नति मंे आरक्षण नहीं मिलेगा साथ-साथ अनुसूचित जाति और जनजाति को रिजर्वेशन इन प्रमोशन नहीं मिलेगा ये निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने दिया। और 16 नवंबर 1992 को दिया इसका मतलब है कि 15 नवंबर 1992 तक अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगांे को रिजर्वेशन इन प्रमोशन लागू था। यदि 15 नवंबर 1992 तक रिजर्वेशन इन प्रमोशन लागू था तो वह रिजर्वेशन इन प्रमोशन सुप्रीम कोर्ट ने 16 नवंबर 1992 को रद्द कर दिया इसका मतलब संविधान ने जो दिया था और सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया यह बात सभी लोगांे को ध्यान रखना होगा। नैसर्गिक न्याय निर्णय के सिद्धांत के अनुसार एससी/एसटी पार्टी हीं नहीं थी तो सुप्रीम कोर्ट ये जानबूझकर कर एससी/एसटी के विरोध मंे फैसला दिया क्यांेकि वे जानते थे कि अनुसूचित जाति और जनजाति अपने अधिकार के प्रति ज्यादा संवेदनशील है जैसे ही यह निरस्त होगा तुरन्त प्रभाव से देश भर में इसके विरोध मंे हंगामा खड़ा हो जायेगा और ये जो हंगामा करने वाले जो लोग है वे अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग होगंे और अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग रिजर्वेशन इन प्रमोशन मंे 16 नवम्बर 1992 के पहले अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग अदर बैकवर्ड क्लासेज के लोगों को  भी रिजर्वेशन मिलना चाहिये था इसका आंदोलन चला रहें थे। लेकिन ओबीसी के जो लोग है वह तो राम मंदिर बनाने के लिए आंदोलन कर रहें थे। कल्याण सिहं उमा भारती, ऋतंम्भरा, विनय कटियार, सारे ओबीसी है ये सारे के सारे राम मंदिर का आंदोलन चला रहें थे जब उन लोगों को मंडल कमीशन का आंदोलन चलाना चाहिये था तब उस समय राम मंदिर का आंदोलन चला रहें थे। और में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग मैदान में मंडल की लडाई लड़ रहें थे। सुप्रीम कोर्ट में बैठे जो जज ब्राह्मण थे उन लोंगो को मालूम था कि अनुसूचित जाति और जनजाति के जो लोग है इनको तो रिजर्वेशन इन प्रमोशन मिला हुआ। उनको जब मालूम हुआ कि ये लोग अदर बैकवर्ड क्लासेज के लोगों की लड़ाई लड़ रहें हैं तो अनुसुचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों का रिजर्वेशन इन प्रमोशन खत्म कर दो। तो ये अपना अंादोलन शुरू करने के लिए बाध्य हो जायेंगे और अदर बैकवर्ड क्लासेज का मामला छोड़ देंगे और अपना रिजर्वेशन इन प्रमोशन लेने के लिए इनको लड़ाई करना पड़ेगा। ये मुद्दा राजनीतिक है। सुप्रीम कोर्ट में बैठे जो न्यायधीश है वह ज्युडिशियल नहीं सोच रहे थे बल्कि वे राजनीतिक सोच रहें थे। यदि इस देश में अनुसूचित जाति और जनजाति, अदर बैकवर्ड क्लासेज का रिजर्वेशन मिला तो इनका धु्रवीकरण रोकना संभव नहीं होगा। यदि एससी, एसटी और ओबीसी का धु्रवीकरण हो गया तो माइनाॅरिटी अपने आप जुड़ जायेगा। जुड़ाने के लिए भी कुछ करने की जरूरत नहीं होगी और 85 प्रतिशत लोगोें का धु्रवीकरण इस देश में हो जायेगा। सुप्रीम कोर्ट में बैठे हुए न्यायधीश ज्युडिशियल नहीं सांेच रहें थे राजनीतिक सोच रहें थे। यदि 85 प्रतिशत लोगों का धु्रवीकरण हो गया तो जो इस देश में ब्राह्मणों की राजनीतिक सत्ता जो उनके नियंत्रण में है वे खत्म हो जायेगी। ये खत्म नहीं होनी चाहिये इसलिए नैसर्गिक निर्णय का मुद्दा न होने के बावजूद भी सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों ने अनुसूचित जाति और अनु. जनजाति को प्रमोशन मंे आरक्षण के मुद्दें केें लोगों को विरोध में फैसला दे दिया है। फैसला देते ही जो अनुसूचित जाति और अनु.जनजाति के लोग जो ओबीसी के रिजर्वेशन इन प्रमोशन की लड़ाई लड़ रहें थे वे उन्होंने लड़ाई छोड़ दिया। और छोड़ने के बाद वे अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग अपने प्रमोशन मंे आरक्षण का हंगामा करने लगे जब एससी और एसटी पूरे देश में रिजर्वेशन इन प्रमोशन के मुद्दे पर हंगामा करने लगें तो 1995 में भारत सरकार रिजर्वेशन के मुद्दे पर संविधान संसोधन करना पड़ा। ये काल्पनिक बातें नहीं यह दस्तावेजी प्रमाण के आधार पर बता रहा हूं।
1995 में भारत सरकार ने संविधान संशोधन करके एससी और एसटी के लोगों को रिजर्वेशन इन प्रमोशन दिया। और देते वक्त ये ध्यान रखा कि ओबीसी को रिजर्वेशन इन प्रमोशन नही मिलना चाहिये यदि ऐसा होता तो रिजर्वेशन के मुद्दे पर एससी एसटी का धु्रवीकरण होगा और रिजर्वेशन इन प्रमोशन के मुद्दे पर एससी एसटी और ओबीसी के बीच झगड़ा होगा। केवल उन्होेंने ऐसा हाइपोथिसिस ही किया। बल्कि वह बात एक दम सामने आ गई मायावती वर्सेज मुलायम सिंह जैसा उन्होंने प्लान बनाया था वह सामने आ गई माया वर्सेज मुलायम सिंह की लड़ाई है ये लड़ाई एससी और एसटी और अदर बैकवर्ड की जो लड़ाई है इससे क्या हुआ जो धु्रवीकरण का जो मामला था वह मंडल कमीशन का मामला था उसको तोड़ने में ब्राह्मण कामयाब हो गया। इस तैयारी के मौके पर ये बात मैं आप लोगों को समझा रहा  हूँ। जुडिसियरी के लोगों को जुडिसियल निर्णय देना चाहिये था जुडिसयरी ने जुडियसियल निर्णय नहीं दिया बल्कि जुडिसियरी ने पोलिटिक्स निर्णय दिया। जुडिसियरी का काम राजनीति करना नहीं है। जब ब्राह्मणों की राजनीति पार्टियों के नेता कमजोर पड़ गये तो ब्राह्मणों ने तो राजनीतिक करने का ठेका सुप्रीम कोर्ट के नेता अपने हाथ में लिया। अभी अभी जस्टिस रिटायर्ड जस्टिस कपाड़िया जब चीफ जस्टिस थे। तो उन्होंने दिल्ली में विधि सम्मेलन के दौरान उसमे उन्होंने पहला मुद्दा उठाया कि न्यायधीशों को संविधान के दायरे में रहकर फैसला देना चाहिये। जो बात मैं कह रहा हूूँ  बल्कि सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस भी कह रहा है। तो इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक डिसीजन दिया ताकि ओबीसी का धु्रवीकरण रोका जाय तो मायनाॅरिटी अपने आप रूक जाती है। यही आप लोगों को समझाना चाहता हूँ कि इसलिए न्यायपालिका ने प्लान बनाकर जुडिसियल डिसीजन देने के बजाय, राजनीतिक डिसीजन देने का काम किया यही बातें आप लोगों को बताना चाहता हूँ आप लोग सोचते होंगे कि ये सुप्रीम कोर्ट के राजनीतिक का मामला हमको क्यों बता रहें यह इसलिए बताया जा रहा है क्योंकि हम लोग यह बात सड़क पर निपटाना चाहतें है। जो लोग संविधान के दायरे में कार्य नहीं करना चाहते हैं मैं उन जजों को चेतावनी देना चाहता हूँ कि अमेरिका में लांस एजेलिंस में एक व्हाइट के कार के नीचे एक ब्लैक मैन दब कर मर गया था। कोर्ट में केस चली जज व्हाइट था व्हाइट जज ने निर्दोष छोड़ दिया। निर्दाेष छोड़ने के दूसरे दिन खबर आई कि जो लांस ऐजेलिस के काले लोग थे वे सारे के सारे सड़कों पर उतर आये और सड़कों पर उतर आने के बाद वे लोग जज के घरों को आग  लगा दी। अगर भारत के सुप्रीम कोर्ट के घरों को जलाना जरूरी है तो हमको भी ऐसा करना पड़ेगा। मैं ऐसा नहीं चाहता। मगर मैं उनको चेतावनी देकर सावधान करना चाहता हूँ कि लांस ऐजेलिस में जो घटना हुआ वह भारत में नहीं होना चाहिये, मगर वह ऐसा कराना चाहते हैं, तो हम करेंगंे। अगर ऐसा उनको करने से ही उनको अकल आयेगी तो हमको ऐसा करना होगा।
साथियों आने वाले समय में सबसे पहले हम लोगांे को ज्युडिसियरी का मुद्दा सबसे पहले नम्बर लेना होगा। हम लोग उसी की तैयारी कर रहें है। क्योंकि संविधान हमारे समर्थन में हैं और न्यायपालिका हमारे विरोध में है। इसलिए न्यायपालिका हमारे अधिकारों को छीनने का काम कर रही है। जबकि न्यायपालिका को न्याय देने का काम करना चाहिये। लेकिन वह न्याय देने का काम नहीं कर रही है। साथियों ये जो निर्णय रिजर्वेशन इन प्रमोशन का है। ये निर्णय योजना बनाकर प्लान बनाना होगा। हमारे लोगों ने हंगामा खड़ा करके संविधान संसोधन करवाया। संविधन संसोधन 1995 में हुआ। होने के बाद में एम नागराजन नाम का एक साउथ इंडियन ब्राह्मण सुप्रीम कोर्ट में गया, यह कहकर गया कि सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्वेशन इन प्रमोशन के विरोध में फैसला दिया था और ऐसी स्थिति में भारत सरकार को संविधान संसोधन करने का अधिकार नहीं है। ये मुद्दा लेकर नागराजन नामक का ब्राह्मण सुप्रीम कोर्ट में गया। सुप्रीम कोर्ट ने 19.10.2006 को सुप्रीम कोर्ट ने इसे संवैधानिक घोषित कर दिया। 1995 में रिजर्वेशन इन प्रमोशन देने के लिए जो संविधान संसोधन हुआ वो 11 साल बाद इसे संवैधानिक घोषित कर दिया गया इसका मतलब है 11 साल तक रिजर्वेशन इन प्रमोशन का हमारा जो अधिकार है वह रोक कर रखा। समर्थन में लिया रोक कर भी रखा यह बदमाशी हम लोगों को समझना होगा, जानना होगा 2006 को जब यह निर्णय दिया। उसके बाद में मायावती के द्वारा रिजर्वेशन इन प्रमोशन के लिए 17.10.2007 को शासनादेश निकाला गया और शासनादेश निकालने के बाद और निकालते वक्त मायावती ने क्या किया और 2001 की जो सामजिक न्याय समिति का रिपोर्ट थी जिसे लगाया (2001 का) और इसी बात को लेकर उत्तर प्रदेश का ये ब्राह्मण इलाहाबाद हाई कोर्ट में गया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट में 4 जनवरी 2011 का निर्णय दिया मायावती का शासनादेश रद्द किया। रद्द करने का आदेश देने के बाद उसके उसी के नीचे लिखा मायावती चाहे तो रिजर्वेशन इन प्रमोशन दे सकती है। सामाजिक न्याय समिति पर रोक लगाया इस वजह से रद्द कर दिया और मायावती सरकार चाहे तो रिजवेशन इन प्रमोशन देे सकती है। जो आदेश सुधारकर और सुप्रीम कोर्ट ने जो तीन शर्ते लगायी है। रिकर्वेड इन प्रजेन्टेशन, कार्यक्षमता, बैकवर्डनेस ये तीन शर्तो का अनुपालन करते हुए यदि राज्य सरकार दूसरा आदेश निकालती है ऐसा निकालने का उनको अधिकार है और उनको रिजर्वेशन इन प्रमोशन दे सकती है और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, क्यों कहा क्योंकि उन्हें यह सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है। इसलिए हम इस निर्णय के विरोध में निर्णय नहीं दे रहें है। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान संसोधन रिजर्वेशन इन प्रमोशन को जायज ठहराया है इसलिए हम रिजर्वेशन इन प्रमोशन को असंवैधानिक घोषित नहीं कर रहें है। हम केवल मायावती का आदेश रद्द कर रहें है। क्यों रद्द कर रहें है। 2007 को आदेश निकाला, 2001 को सामाजिक न्याय समिति को आधार बनाया। जबकि उसे नई सूची के आधार पर तुलना कर नई रिपोर्ट बनानी चाहिए थी जो नहीं बनाई। इसीलिए मायावती के शासनादेश को रद्द कर दिया।
इस वजह से मायावती के आदेश को रद्द कर दिया गया। रद्द करते ही मायावती के सामने संकट खड़ा हो गया होगा, संकट खड़ा होते ही मायावती ने क्या किया होगा। मायावती ने उसका जो लिगल सलाहाकार सतीश मिश्रा को बुलाया होगा, और बुलाकर क्या कहा होगा मैं अंदाज से बाताता हूं और पूछा होगा कि मिश्रा जी ये इलाहाबाद हाई कोर्ट का डिसीजन आया है क्या करें। तो मिश्रा जी ने कहा होगा कि बहन जी यदि इस निर्णय को सुधार कर लागू करते हैं तो अनुसूचित जाति और जनजाति को तो लाभ होगा लेकिन सर्वजन समाज नाराज हो जायेगा। और अभी 2011 को निर्णय आया है और अभी विधान सभा का चुनाव है, सर्वजन समाज नाराज हो जायेगा। बहन जी ने पूछा नाराज होगा, अच्छा, मिश्रा जी फिर क्या करें, सर्वजन समाज नाराज न हो, क्या करना होगा।तो सतीश मिश्रा ने कहा होगा यदि हम लोग इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय को सुधार कर लागू करने के बजाय, सुप्रीम कोर्ट में अपील करते हैं तो उत्तर प्रदेश के अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को संदेश चला जायेगा। कि मायावती अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सुप्रीम कोर्ट से लड़ रही है और लोगों में यह संदेश चला जायेगा। और अनुसूचित जाति और जनजाति के उत्तर प्रदेश का जो वर्ग है खुश हो जायेगा, कि बहन जी हमारे लिए सुप्रीम कोर्ट से लड़ रही है और बहन जी वह आपको वह वोट दे देगा। और सुप्रीम कोर्ट इस निर्णय को स्टे (रोक) नहीं देगा। तो सर्वजन समाज वो भी नाराज नहीं होगा। जब रिजर्वेशन इन प्रमोशन लागू नहीं होगा तब सर्वजन नाराज नहीं होगा, और अनुसूचित जाति और जनजाति खुश भी हो जायेगा। और इस तरह से दोनों का वोट बहन जी आपको मिलेगा। और आप पुनः मुख्यमंत्री बनेंगी। बहन जी कहती हैं यह बहुत बढ़िया प्रोफार्मा दिखता है। ये सब को खुश करने का एक तरीका है। मान लिया मायावती ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के बाद में उत्तर प्रदेश का चुनाव आया।
मायावती को वोट नहीं मिला। वोट न मिलने से मायावती को एहसास हुआ कि मेरा जो बेसिक वोट है। वह नाराज हो गया है। इसलिए मायावती ने प्लान बनाया कि यह जो मेरा बेसिक वोट है फिर से वापस आना चाहिये। तो क्या हुआ मायावती ने विधान परिषद की सदस्यता को खारिज कर दी और राज्य सभा की सदस्यता स्वीकार कर ली। स्वीकार करने के बाद मायावती राज्य सभा में गई। राज्य सभा में जाने के बाद उसने सोचा जो लोग मुझसे मेरे लोग नाराज हो गये थे उनको फिर से लाना होगा। और फिर से वापस लाने के लिए मायावती ने राज्य सभा में हंगामा खड़ा कर दिया। उत्तर प्रदेश के लोगों ने तो जरूर देखा होगा। हंगामा खड़ा करने के बाद में केन्द्र सरकार को लगा कि गुजरात में मेघालय में और मध्य प्रदेश में दिसम्बर के चुनाव में यदि मायावती इन लोगों से उत्तर प्रदेश में लाभ लेना चाहती है तो मायावती मेघालय, गुजरात, और मध्य प्रदेश में तो चुनाव लड़ने वाली नहीं और लड़ेगी भी तो उसका कोई संगठनात्मक आधार नहीं है। यदि हम भी इसका लाभ लेना चाहते हैं तो हमको भी जल्द ही में संविधान संसोधन का मुद्दा राज्य सभा में उपस्थिति कर देना चाहिये, और इसका फायदा मायावती के साथ-साथ कांग्रेस को भी मिलना चाहिये। इसके लिए सर्वदलीय मिटिंग प्रधानमंत्री ने बुलायी। सर्वदलीय बुलाने के बाद में कांग्रेस के जेब में रहने वाले जो अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग रखैल (हां में हां मिलाने वाले) जो महासंघ चलाने वाले देवी संगठन बहुत सारे रूके हैं। उनको धीरे से बोल दिया कि लाखों की भीड़ में लेकर आओं और उनके साथ ये भाषण करों, कि यदि केन्द्र सरकार संविधान संसोधन कर दें तो हम लोग 2014 के चुनाव में उनका प्रचार-प्रसार करेंगे देवी संगठन के नेता थे, वे लोग वहां पर कई लोगों को इकट्ठा किये और वहां पर घोषित कर दिया कि हम लोग 2014 में कांग्रेस के चुनाव में प्रचार करेंगे। ये बात 15 दिन पहले ही उड़ीसा में बता दिया। बाद में किसी ने फोन करके कहा मेश्राम जी आप बता रहें थे ऐसा कोई भाषण हो रहा था। मैने कहा बुरबक! ये सारा राजनीति का खेल है रिजर्वेशन इन प्रमोशन देने का मामला नहीं। ये वोट लेने का मामला है ये वोट लेने का मामला हो गया है। इसलिए उन्होंने प्लान बनाया और संविधान संसोधन की बात को पार्लियामेंट में रखा। मै ये बात आप लोगों को बता देना चाहता हूँ। ये बदमाशी कैसे है। ये ड्राफ्ट जब मैं पार्लियामेंट से निकाल कर लाया। मगर किसी को पता नहीं है। मगर ये जो संविधान संसोधन का ड्राफ्ट है इसमें यह लिखा हुआ है, और सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्णय दिया है एम नागराजन के केस में, उसने कहा कि पिछड़ापन का जो सर्वे रिपोर्ट होगा उसमें पिछड़ापन को भी निर्धारित करना होगा। ऐसा लिखा पिछड़ापन (बैकवर्ड नेस) निर्धारित करना होगा। संविधान संसोधन में बैकवर्ड नेस निर्धारित नहीं किया है। इस मुद्दे पर केन्द्र सरकार और मायावती धोखाधड़ी कर रही है। एक बार धोखाधड़ी कर चुकी मायावती, कैसे कर चुकी, 2007 में आदेश निकाला और 2001 की सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट लगाई है। इसका मतलब है कि मायावती को मालूम नहीं था। इस वजह से उन्होंने सर्वे रिपोर्ट तैयार नहीं किया, लेकिन ऐसा नहीं है मायावती को मालूम था इसलिए मायावती ने सामाजिक न्याय समिति का रिपोर्ट लगाया। ये दस्तावेजी प्रमाण है, कि मायावती ने गलत रिपोर्ट लगाया। मायावती को मालूम था रिपोर्ट देना था। नहीं मालूम था ऐसा नहीं था। मालूम होने के बावजूद भी गलत रिपोर्ट दिया। इसका मतलब है कि मायावती ने एससी एसटी को बेवकूफ बनाने काम किया और धोखा देने का काम किया। और राज्य सभा में जो संविधान संसोधन का जो ड्राफ्ट है। इसमें लिखा है। ‘‘सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया बैकवर्डनेस को सर्वे में आईडेन्टीफाई करना है। संविधान संसोधन मंे बैकवर्ड नेस को आईडेन्टीफाई नहीं किया। बैकवर्ड को आईडेन्टीफाई किया। लिगल टर्न में कांस्टीट्यूशन में, वह जो क्वामा (,) होता है उसकी भी व्याख्या होती है। तो सुप्रीम कोर्ट ने एम नागराजन के केस में बैकवर्डनेस निर्धारित करने के लिए कहा और संविधान संसोधन इसका भी न हो। मगर संविधा संसोधन मंे बैकवर्ड को निर्धारित किया, बैकवर्डनेस को निर्धारित ही नही किया। और जब ये ड्राफ्ट तैयार हो रहा था तब भारत सरकार ने एटार्नी जर्नल भारत सरकार का गुलाम वाहनवती वहां वह सरनेम है एटार्नी जर्नल का, महाअधिवक्ता एटार्नी जर्नल से भारत सरकार ने सवाल पूछा। तो भारत सरकार को एटार्नी जनरल को लिखित सलाह देनी पड़ती है। तो उसने लिखित सलाह दिया। ये संविधान संसोधन टेनेवल नहीं होगा ये संवैधानिक घोषित नहीं होगा ये सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज होगा। और सुप्रीम कोर्ट इसे असंवैधानिक घोषित कर देगी इसके लिए लिखित फिर दस साल तक लगा देगी। और फिर आप का दस साल तक रिजर्वेशन इन प्रमोशन वैसे का वैसे ही पड़ा रहेगा। और दस साल के बाद वह असंवैधानिक घोषित होगा। फिर और राजनीतिक नेताओं को इस मुद्दे पर लड़ाई झगड़ा करके, फिर वोट लेने का बहाना मिल जायेगा। तो ये जो है वोट लेने का हथकण्डा हो गया है। इस हककण्डे से हम लोगों को बचने की जरूरत है। नहीं तो आप लोग इस्तेमाल हो जाओगे। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है। यह जो मेेरे पास इलाहाबाद हाई कोर्ट का डिसीजन और सुप्रीम कोर्ट के डिसीजन की काॅपी है स्टेडी करने के बाद बता रहा हूँ। मुझे आप का वोट नहीं चाहिये, और न मैं चुनाव लड़ने वाला हूँ, ये जो लड़ाई है मैं ये लड़ाई लड़ना चाहता हूँ यह लड़ाई ऐसे में नहीं लड़ी जा सकती, तथ्यों के आधार पर, सत्य के आधार पर, लड़ी जा सकती है। इस बात को साथियों हम लोगों को समझना होगा। इसलिए ये बात आप लोगों को बता रहा हूँ। ये जो संविधान संसोधन हो रहा है। ये संविधान संसोधन, ये भी धोखाधड़ी होने का मामला है। एटार्नी जर्नल ने कह दिया कि इसे संवैधनिक मान्यता सुप्रीम कोर्ट में नहीं मिलेगा। स्कूडटरी होगी। ये साधारण है ये जो पार्टी के लोग है। ये जो शासक वर्ग ब्राह्मण है। वह इशारा कर देता है। यदि वह एक आदमी को इशारा कर दिया। तो वह दूसरे दिन केस लेकर सुप्रीम कोर्ट में चला जाता है। आज कल ऐसा हो रहा है। हाई कोर्ट में जज ही इशारा कर देता है। ले आओं इसका बंदोबस्त कर देता हूँ। इतनी बदमाशी न्यायपालिका में चल रही है। हद से ज्यादा लिमिटलेस हो गया है। सहनशीलता होती हैं लिमिट भी होता है।
इस तरह से साथियों ये धोखाधड़ी की बातें, इस मुद्दे पर संविधान संसोधन हो रहा है इस मुद्दे पर भी हम लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है, कि कुछ लोग संविधान संसोधन करने के लिए दिल्ली में मोर्चे निकालने का काम लगा रहें है और जो लोग लगा रहें है। और उन लोगों के नाम पतें भी जानता हूँ। वह क्या करते है।
अब जो दूसरा मुद्दा है। ओबीसी के 52 प्रतिशत रिजर्वेशन का मामला और 52 प्रतिशत ओबीसी के रिजर्वेशन इन प्रमोशन का मामला आने वाले समय में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के रिजर्वेशन इन प्रमोशन के लिए और अदर बैकवर्ड क्लासेस के लोगों की हम लोग लगातार लड़ाई जारी रखेंगे। अगले साल सम्भवतः उत्तर प्रदेश में हर 4 महीने में रैली हम करेंगे सारे जिलों में, तहसीलों में, ब्लाकों में ये जनजागरण का काम लगभग छः लाख गंावों में जनजागरण का काम आने वाले समय में चलाते रहेंगे। ताकि इस मुद्दे पर सरकार को सूचना दे दी जाए। दूसरा काम यह भी सोचा जो अनुसूचित जाति और जनजाति के एमएलए है और समाजवादी पार्टी के सरकार में बहुमत है। लगभव 56 एमएलए अनुसूचित जाति और जनजाति के हैं। तो अब जो ये कार्यक्रम ऐसा बनाया जा रहा है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग, जिस क्षेत्र से चुनाव लड़कर जीतकर आयें है उन क्षेत्र में उनका घर होगा। और लोग वे उनके घर पर मोर्चा लेकर जायेंगे, और उनको कहेंगेे  अनुरोध करेंगे कि ये जो सामाजिक समस्याओं का मामला उनके घर पर कहेंगे। यदि ये अनुरोध आप नहीं सुनेगें तो हम लोग आपके घर पर ये मोर्चा ले जाना होगा। यदि 1000.2000 का मोर्चा अगर एमएलए के घर पर गया तो, अगले चुनाव में उसको वोट मिलना नहीं हैं और न वह प्रचार करने के लिए क्षेत्र मे जा सकेगा। यदि वह प्रचार करने के लिए नहीं जा पायेगा तो 2014 के चुनाव में समाजवादी पार्टी को वोट नहीं चाहिये। राजनीतिक नेता को वोट की बात बहुत जल्दी समझ में आती है। चाहे उसको कोई बात समझ में न आवें लेकिन वोट की बात समझ में आती है। इसको हम लोगों को करना होगा और जो बैकवर्ड क्लासेस के एमएलए है उसके लिए बैकवर्ड क्लासेस के लोग ओबीसी का जो एमएलए है उसके घर मोर्चा लेकर जायेंगे। ताकि उनको लगना चाहिये कि बैकवर्ड क्लासेज के लोग यदि वोट  नहीं देंगे तो मैं चुनाव कैसे लडूँगा। ये कार्यक्रम आने वाले समय में ऐसा हम करेंगे।
तीसरा मुद्दा है उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी चुनाव के दौरान मुसलमानों को 18 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही थी, हम इसका समर्थन करते हैं और मुलायम सिंह को यह बात मैं अच्छी तरह से जानता हूँ वह जो भी आश्वासन देते हैं उसका वह पालन करते है। उसकी खासियत है। ये जो उनका सत्यवादी चरित्र हैं मैं उनसे अनुरोध करता हूँ ये जो मुसलमानों का 18 प्रतिशत है उनकों वह दें दंे। हम उसका समर्थन करते हैं।
चैथा मुद्दा है जाति आधारित गिनती, और ओबीसी की जाति आधारित गिनती इसके साथ केन्द्र सरकार ने धोखाधड़ी की और उत्तर प्रदेश का मुखिया ओबीसी है। तो ओबीसी की धोखाधड़ी की गिनती न हो इसके आधार पर वह खबरदारी करता है, और वह उत्तर प्रदेश का मुखिया है जबकि वह अपने प्रदेश में, जब केन्द्र सरकार ने उनको पैसा दिया उस पैसे का उपयोग करके सही सही गिनती करवाई जानी चाहिए, और इतना ही दूसरे ओर यूपीए की सरकार कांग्रेस की सरकार है वे गिनती के आकड़े सही इकट्ठा नहीं कर रहें है। वहां ये सही आंकड़ा इकट्ठा करे। ताकि सभी लोगों के साथ न्याय हो जाये।
पांचवा मुद्दा है। अतिपिछड़ी जातियों का वर्गीकरण।आठ राज्यों के लोगों को अनुसूची जाति बनाकर उनको न्याय देने की कोशिश की अगर कैडराईजेशन किया जाता है तो ये ब्राह्मणों के झांसे में नहीं फंसेंगे। यदि नहीं किया गया तो वह ब्राह्मण क्या कहेंगे। वह अतिपिछड़ी वर्ग के घरों में जायेंगे और उनको उनके प्रति भड़कायेंगे और कहेंगे, सारा आरक्षण कुर्मियों ने ले लिया, सारा आरक्षण यादव ने ले लिया, सारा आरक्षण कहारों ने ले लिया, सारा आरक्षण लोनी ने ले लिया। ऐसा प्रचार करके अति पिछड़ी लोगों को ब्राह्मण लोग अपने झांसे में लेंगे। और उनको इस तरह इस्तेमाल करेंगे। इसलिए मैं इस बात का समर्थन करता हूँ कि अतिपिछड़ी जातियों का कैडरराईजेशन अलग किया जाए जिससे। उनको न्याय भी मिले और वे ब्राह्मणों के ब्राह्मणी करण के झांसे में भी न फंसे। अगर वह ब्राह्मणी करण के झांसे में फंसते हैं तो यह सारे देश का सत्यानाश का कारण बनेंगे। इसलिए हम लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है।
6 नम्बर का जो मुद्दा प्रबन्धक का है माध्यमिक एवं महाविद्यालयों में प्रधानाचार्य के एकल पद को खत्म करने के सुप्रीम कोर्ट और राज्य सरकार के जो निर्णय हैं। हम उसके विरोध में है। मैं इसका एक समाधान प्रस्तुत करता हूँ। सारे प्रदेश में टोटल प्रधानाचार्य कितने है उसकी एक लिस्ट बनायी जाये, एक कैटगरी बनायी जाए। और कैटेगरी में 100 प्रधानाचार्य है तो 50 एससी, एसटी, ओबीसी के लोगों को निर्धारित कर दिया जाए। अन्यथा ये व्याख्या है जो एकल पद है यह लागू नहीं होगा। ये अन्याय पद का मामला है इसको सुधार किया जा सकता है।
सातवां मुद्दा है सत्र न्यायालय में और उच्चतम न्यायालय के सरकारों में वकीलों की नियुक्ति में मेवालाल बनाम राज्य सरकार केस के मंे ये जो वकील होतें है सरकारी ये एम्पलाईज नहीं होतें है। यानि एम्पलाईज लोगों में पहले से रिजर्वेशन इन प्रमोशन लागू है, तो वकीलों को भी इसमें भी लागू करने से कोई बाध्य नहीं है। इसलिए निर्णय होने के बावजूद भी इसे लागू नहीं किया जा रहा है। ये अन्याय करने वाली बात है इसके विरोध में भी हम लोग आंदोलन कर रहें है।  हम लोगों को यहां जो सारे प्रदेश से आयें है ये सारे मुद्दों के लिए हम लोग जन-जन में फिर जागरण करना होगा। और अपै्रल महीने में पुनः दोबारा रैली होगी अगर आप लोग सड़कों पर फैसले करना चाहतें हो तो। मैं इस पर यकीन करता हूँ। क्योंकि ये लोग विवेक बुद्धि की बातें नहीं मानते, ये न्याय की बातें नहीं मानते है ये संविधान की बातें नहीं मानते है। इसलिए सड़कों पर ही उतरना होगा मगर जितनी संख्या में आप आयें है। ये काफी संख्या है। मगर इतनी संख्या में जो शासक वर्ग है उसको झुकाना संभव नहीं हैं। आने वाले समय में कई लाखों की संख्या में हम लोगों को, रैली करनी होगी, और अगर हम ऐसा करते हैं तो मैं यकीन करता हूँ कि हम लोग, जो शासक वर्ग है, और हम जैसा चाहते हैं, वैसा हम उनको करने के लिए मजबूर कर सकते हैं।
बिहार में ग्रामीण चैकीदार चैथी श्रेणी के कर्मचारी 90 में बनाये गये है ग्रामीण प्रसव दायियों को 5000ध्. हजार मिलता है और चैथी श्रेणी के चैकीदार को 17000ध्. हजार रूपये मिलता है जबकि उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं मिलता है। यह भी बहुत बड़ा मुद्दा हैं इसको भी आने वालें समय में हम उत्तर प्रदेश में भी उठायेंगे। इसी के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

Saturday, 22 September 2012 02:11



कोलकाता।। आर्थिक सुधारों को जायज ठहराने के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के राष्ट्र के नाम संदेश की पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तीखी आलोचना की है। ममता ने पीएम को निशाने पर लेते हुए कहा कि सत्ता का इस्तेमाल 'आम आदमी को खत्म' करने के लिए किया जा रहा है।

ममता ने फेसबुक पर लिखा, 'मैं पूछना चाहती हूं कि आम आदमी की परिभाषा क्या है? लोकतंत्र की परिभाषा क्या है? क्या यह साफ नहीं है कि आम आदमी का नाम लेकर सत्ता का दुरुपयोग किया जा रहा है? आम आदमी को खत्म किया जा रहा है। क्या यह सोची समझी चाल नहीं है?'

ममता बनर्जी का यह कॉमेंट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के राष्ट्र के नाम संबोधन के तुरंत बाद सामने याया। पीएम ने अपने संबोधन में डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी और मल्टी ब्रैंड रीटेल में एफडीआई के फैसले को जायज ठहराया था।

घाटा घोटालों से, सब्सिडी से नहीं: बीजेपी
उधर, बीजेपी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के राष्ट्र के नाम संदेश की तुलना विदेशी कंपनी के कारोबारी प्रमुख के संबोधन से की। बीजेपी ने कहा कि सरकार को घाटा घोटालों से है, गरीबों को दी जा रही सब्सिडी से नहीं। बीजेपी उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि प्रधानमंत्री देश को आर्थिक उदारवाद नहीं बल्कि उधारवाद का संदेश दे रहे थे।' देश के चौराहों, चौपालों, खेतों और खलिहानों में विदेशी पूंजी निवेश के खिलाफ चल रही हवा को बदलने के लिए प्रधानमंत्री ने 'डालरी डायलॉग' का सहारा लिया।' उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने देश को गुमराह किया है और हड़बड़ी में चौतरफा गड़बड़ी भी की है।