आदिवासी को निशाना इस लिए बनाया जा रहा है क्यों कि वहा पर मनुवादी लोग पूजीपति को देना चहते है
जंगल की लड़ाई में निशाने पर आदिवासी को निशाना
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देश में वन्य जीवों के लिए अभी हालात बेहतर होते नहीं दिख रहे हैं। हाल में पश्चिम बंगाल में वन विभाग की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक वहां के दोर्स और तराई इलाकों में 2007 से अब तक वन रक्षकों और आदिवासियों के बीच की मुठभेड़ों में 13 आदिवासियों की मौत हुई है। वहां के ‘एसोशिएसन फॉर दि प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स और उत्तरबंगा वन श्रमजावी मंच (यूबीएसएम) जैसे मानवाधिकार संगठन उनके गरीब और निर्दोष होने का दावा कर रहे हैं जबकि वन विभाग उन्हें लकड़ी माफिया बताता रहा है। विभाग की मानें तो ये आदिवासी रात के अंधेरे में गाय चराने या लकड़ियां चुनने के बहाने तस्करी को अंजाम देते हैं। जबकि संगठन कहते हैं कि आदिवासी लकड़ियां बीनने और रोजमर्रा के दूसरे कामों के सिलसिले में जंगलों में घुसते हैं। वन विभाग का यह सवाल भी गैरवाजिब नहीं है कि उन लोगों को लकड़ियां बीनने से कोई नहीं रोकता है लेकिन वे देर रात अपने किस निजी काम के लिए बक्सा बाघ अभ्यारण्य जैसे क्षेत्र में घुसते हैं? ऐसी स्थितियों के मद्देनजर राष्ट्रीय स्तर पर वन सुरक्षाकर्मिंयों की आदिवासियों से मुठभेड़ और वन, वन्य जीव संरक्षण की इस असलियत का खुलासा बहुत जरूरी है। एक ही सिक्के के दो पहलू दर्शाती यह स्थिति महज बंगाल में ही नहीं, बल्कि कमोबेश पूरे देश में है। हालात इतने उलझे हैं कि केंद्र सरकार बीते साल 2011 की शुरु आत से ही हरित वन योजना के जरिये उजड़ते वन क्षेत्रों को फिर से लहलहाने की कोशिश कर रही है जबकि वन तस्करों के खतरनाक मंसूबे देश भर में बढ़ते जा रहे हैं। बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, असम, पश्चिम बंगाल जैसे कम से कम सात सूबों में तो आज हर अपील और गुजारिश बेअसर साबित हो रही है। खासकर आदिवासी बहुल इन राज्यों में विनाश की लड़ाई का मंजर सबसे ज्यादा भयावह है। जिन राज्यों में उनके आशियाने अस्थाई अथवा कम संख्या में हैं, वहां वे दूसरे राज्यों से रोजगार के लिए आते- जाते रहते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में खैरा, सीसम, सागौन और बेंत की तस्करी में लिप्त अनगिनत गिरोहों का नाम ही जंगल पार्टी है। वीरप्पन नहीं रहा लेकिन कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में उसके नुमाइंदे अब भी कमान संभाले हैं। जंगलों के नजदीक रहने वाले बेहद गरीब, अशिक्षित, और संसाधनहीन लोगों के नियमित और वैकल्पिक रोजगार क्या हैं? इस बारे में मानवाधिकार संगठनों को भी मंथन करने की जरूरत है। कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हें मजबूरी में बड़े तस्करों के लिए ऐसे गैर कानूनी काम करने पड़ते हैं। उदाहरण के लिए देश भर में चल रहे ईट भट्ठों पर झारखंड और दूसरे राज्यों के लाखों आदिवासी सपरिवार मजदूरी करते हैं। इस मौसमी रोजगार के लिए उन्हें गांवों और इंसानी बस्तियों से दूर उन भट्ठों पर ही सुनसान जगहों पर ईट के कच्चे घर बनाकर रहना पड़ता है। बताया जाता है कि इन विषम हालात का फायदा उठाकर वे चावल और महुआ वगैरह की कच्ची शराब बनाकर आसपास के गरीब तबके के लोगों को सस्ते दाम पर बेचते हैं जिसे पीने के बाद बड़ी तादाद में लोग मारे जाते हैं या अपाहिज हो जाते हैं। वन विभाग की मानें तो उसी तरह वन तस्करों के साथ शामिल हो कर ये आदिवासी भी जंगलों के किनारे रहते हुए दिन में दूसरे रोजगार करते हैं और रात के अंधेरे में जंगलों में घुसकर पेड़ों की अवैध कटाई, ढुलाई, जंगली जानवरों का शिकार और उनके अंगों को इधर-उधर पहुंचाने का काम करते हैं जिसके एवज में तस्करों द्वारा कुछ रकम मिल जाती है। एक और समस्या यह है कि सुरक्षाकर्मिंयों को आज भी बड़े तस्करों के अत्याधुनिक हथियारों के मुकाबले केवल निजी बंदूकें और दशकों पुरानी राइफलें ही मुहैया हैं। इसी कमजोरी के चलते मुठभेड़ों में आदिवासी और कथित वन तस्कर बच निकलते हैं या फिर, कमजोर पड़ते सुरक्षाकर्मिंयों को ही जान बचाने के लिए मुठभेड़ स्थल से भागना पड़ता है। पिछले साल उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में रात के समय पेड़ काट रहे वन तस्करों द्वारा सुरक्षाकर्मिंयों पर आरियों से हमला करने की घटनाएं भी घटी हैं। यहां जिक्र करना लाजिमी होगा कि कोलकाता के विशेष सत्र न्यायालय को फरवरी 2000 में दी गयी सीबीआई की जानकारी के मुताबिक पुरु लिया में 17-18 दिसम्बर, 1995 को गिराये गये घातक हथियारों में शामिल 500 एके 47 राइफलों में से महज 87 ही पुलिस के हाथ लग पायीं जबकि इनकी 15 लाख से ज्यादा गोलियों में से ज्यादातर का आज तक कुछ पता नहीं चला है। इनमें से बहुत से हथियार तस्करों और उनके सहयोगियों के पास होने की आशंका है, जिनके जरिये वे भयादोहन करते हैं। देश के ज्यादातर वन क्षेत्रों में वन सुरक्षाकर्मिंयों को आज तक विभाग की ओर से आधुनिक हथियार मुहैया नहीं कराये जा सके हैं। उन्हें दशकों पुरानी निजी बंदूकों और साधारण राइफलों के सहारे ही तस्करों से भिड़ना पड़ता है। वन विभाग जिन लोगों को शिकारी और वन तस्कर कहता है, वे बाघों और दूसरे जंगली जानवरों के मारे गये शिकार पर, उनके विश्राम के दौरान छिप कर जहर डाल देते हैं या राह में लोहे की कीलों और दूसरे नुकीले हथियार बिछा कर उन्हें घायल करने के बाद आसानी से उनकी हत्या कर देते हैं। स्थानीय आदिवासियों की मजबूरी का फायदा उठाकर यह सारा काम बड़े तस्कर परदे के पीछे रहकर अंजाद देते हैं, इसीलिए अदालत से कानूनी पेचों और कमजोरियों का लाभ उठा कर छूट जाते हैं। क्योंकि इस नाम पर भी गरीब और बेबस आदिवासी वनवासी ही पकड़े जाते हैं। कुल मिलाकर नतीजा होता है वनों और वन्य जीवों की तबाही, कानून और सुरक्षाकर्मिंयों की हार और जीत अंतत: वन तस्करों की। ऐसे में सरकारी मशीनरी और मानवाधिकार संगठनों को स्थानीय लोगों के साथ तालमेल बिठा मजबूर आदिवासियों और वनवासियों पर वन अपराधी होने का ठप्पा लगाने की जगह उनके पुनर्वास और स्वस्थ रोजगार के लिए पहल करने और योजनाएं चलाने की जरूरत है। उन लोगों के अनुभवों और सम्पर्कों का वन तस्करी को रोकने में इस्तेमाल होने की स्थिति में इंसानी स्वार्थ की इस लड़ाई को काफी हद तक रोका जा सकता है। |
मंगलवार, 11 सितंबर 2012
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