Date/Time :- Tuesday 26th of July 2011 01:15:01 PM
अजब है यह मंजर जहां पर दलित के पास सिर्फ
अत्याचार, पीड़ा, अपमान और ज्यादतियों को सहने के सिवाए कोई दूसरा रास्ता
नहीं है। इन्हें खुशी मिलना तो दूर की बात है, इनके चेहरों पे मुस्कान आना
एक ख़्वाब जैसा है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट से यह साबित हो रहा है कि
भारत में हर 18 वें मिनट पर कोई न कोई दलित अत्याचार का शिकार हो रहा है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट नेदलितों पर होने वाले अत्याचारों को
लेकर भारतीय समाज और सरकार दोनों को आइना दिखाया है।
संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट ने दलितों की हक़ीक़त को सामने लाकर
उनके विकास के सारे दावों की पोल खोलकर रख दी है। रिपोर्ट से यह साबित होता
है कि हर रोज़ तीन दलित महिलाएं बलात्कार की शिकार होती हैं, हर हफ्ते
पांच दलितों के घर जलाए जाते हैं, छह का अपहरण होता है। इसके अलावा रोज़ाना
11 दलितों की पिटाई होती है और हर हफ़्ते में 13 दलितों की हत्या होती है।
दलितों पर होने वाले घटनाओं को बारीकी से देखते हैं तो कुल मिलाकर हर
18वें मिनट में किसी न किसी दलित पर अत्याचार हो रहा होता है।
देश के 11 राज्यों
के 565 गांवों में कराए गए सर्वे से यह बात सामने आई है। यह भी तय है कि
अन्य गांवों या राज्यों की स्थिति इससे बेहतर की उम्मीद नही की जा सकती है।
यह आंकड़े पिछले पांच साल के हैं। यह आंकड़े उस स्थिति के हैं जब आज भी
तमाम थाने में दलितों पर अत्याचार की रिपोर्ट नहीं लिखी जाती। इसके आलावां
कई दलित तो खुद ही रिपोर्ट नहीं लिखवाते हैं, क्योंकि उनके मन में डर समाया
होता है।
लगातार कहा जा रहा कि समाजिक बदलाव हो रहा है। क्या यही बदलाव
देखने को मिल रहा जहां पर दलितों की हालत आज के दौर में भी दर्दनाक है।
बदलते दौर के बीच किए जाने वाले दावे को ये आंकड़े बता रहे हैं कि सभी दावे
बस कागजी भर हैं। इसी अध्ययन में जारी कई अन्य आंकड़ों को देखें तो वह भी
दलितों पर अत्याचार की बानगी को ही पेश कर रहे हैं।
हैरान करने वाली बात यह है कि आंकड़ों के मुताबिक 33 फीसदी गांवों
में स्वास्थकर्मी दलितों के घर जाकर उनका इलाज करने से मना कर देते हैं।
करीब 38 फीसदी सरकारी स्कूलों में दलित बच्चों को दोपहर का भोजन अलग बैठा
कर कराया जाता है। 23.5 फीसदी गांवों में दलितों को उनके घरवालों की
चिठ्ठी नहीं मिलती। यानि दलित समाज के 100 में से लगभग 25 लोगों को डाकिया
उनकी चिठ्ठी नहीं देता है। वहीं लगभग 50 फीसदी (48.4) गांवों में दलितों
को सावर्जनिक जल स्रोतों से पानी नहीं लेने दिया जाता है।
उच्च समुदाय के लोगों से दलित कितने प्रताड़ित
हैं, इसका लेखा भी इस अध्ययन में है। इसके मुताबिक 27.6 फीसदी गांवों में
दलितों को थाने तक नहीं पहुंचने दिया जाता है। बदलते भारत की क्या यही
हक़ीक़त है। आज हम लोग बाते तो बड़ी-बड़ी करते है, लेकिन अपने अंदर से
मनुवाद की जम चुकी जड़ को उजाड़ नहीं पा रहे हैं। जब तक इस मनुवाद को अपने
अंदर से नही निकालेंगे तब तक छुआ छूत की इस बीमारी का सफल इलाज समाज से
नहीं हो सकता है।
दलितों पर होने वालो अत्याचारों के ये आंकड़ें उस देश के हैं जिसके सबसे
बड़े राज्य की मुख्यमंत्री दलित महिला हैं। वो एक लंबे दलित आंदोलन के
ज़रिए सत्ता के शीर्ष पर पहुंची है। दलितों पर अत्याचारों का ये सच इसके
बावजूद है कि देश की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के भविष्य
के प्रधानमंत्री पद के दावेदार राहुल गांधी पिछल कई साल से दलितों के
पार्टी से जोड़ने के लिए उनके घरों मे जाकर न सिर्फ़ खाना खा रहे हैं बल्कि
वहीं रात भी गुज़ार रहे हैं। दलितों को लेकर राजनीति तो देश मे हर कोई कर
रहा है लेकिन समाज में उन्हे बराबरी का दर्जा दिलाले की पहल कहीं से नहीं
हो रही।
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